Thursday, July 9, 2009

मॉनसून और हमारी सरकार

अगर धरती पर बारिस की बूँदें नही टपक रही है तो उसके लिए कौन कसूरवार है? क्या इस बात का मुक्कमल जवाब है हमलोगों के पास। शायद नही। अगर हमसब इस बात पर गौर करना शुरू कर दें तो शायद बारिस होने का हल भी निकल आए। हमलोगों ने अगर अपने पर्यावरण के बारे में सही तरीके से सोचा होता तो आज यह दिन देखना न पड़ता। हम आसमान की ओर टकटकी लगाये रहते हैं की अब बारिस होगी तब बारिस होगी लेकिन बादल आज दूर दूर तक नज़र नही आते। गरमी इतनी बढ़ गयी है की अब बर्दास्त नही होती। आदमी और जानवर दोनों परेशान हैं। लेकिन सबसे अहम् सवाल यहाँ यह है इसके लिए कौन जिम्मेवार है। सिर्फ़ हम या हमारी सरकार या बाज़ार। कुल मिलकर हमसब अपने पर्यावरण की बर्बादी के लिए ज़म्मेवार हैं। हमने शुरू में पेंड़ को कटा। बाद में जंगल को। और फिर उसके बाद अपनी धरती को बरबाद करना शुरू कर दिया। जब इससे भी हमारा मन नही भरा तो हमलोगों ने अपने आसपास वाहनों का धुंआ फैलाना शुरू कर दिया। नतीज़तन हमारे फेफडों में धुंए सा ज़हर फैलाना शुरू हो गया। आज हमसब मर रहे हैं । खैर मरना तो वैसे भी है। अब हम अपने अलावा अपनी सरकार के बारे में बात करें की वो अबतक पर्यावरण की रक्षा के लिए क्या कदम ठोस कदम उठायी है। जहाँ तक हमारी समझ से सरकार ने अबतक वैसी कोई पहल नही की जिससे पर्यावरण को बचाया जा सके। आज भी कल कारखाने बेधड़क आसमान में धुंए उगल रहें हैं। लाखों करोड़ों की तादाद में सड़क पर चलती गाडियाँ धुएँ छोड़ रहीं हैं। बड़ी बड़ी अपार्टमेन्ट में लगी एसी के कारण हमार ओजोन मंडल में और भी बड़ा छेद होता चला आ रहा है। हम दिन पर दिन एसी का और भी प्रयोग करते चले जा रहे हैं। अगर सही रूप में देखा जाए तो आज हमारे असंतुलित पर्यावरण का सम्बन्ध सरकार और बाज़ार से है। पर्यावरण रूठ चला है और मानसून भी। आज हमारी सरकार अगर बाज़ार पर अंकुश लगाये और वैसी चीज़ों के उत्पादन पर प्रतिबन्ध लगाये जिससे पर्यावरण को खतरा हो तो हमारा रूठा मानसून भी वापस चला आएगा। और हमारे किसानों के चहरे पर मुस्कान भी।

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